हिन्दी सिनेमा में नायक की संकल्पना
संस्कृत नाट्य शास्त्रों में चार प्रकार के नायकों का जिक्र है धीर ललित धीर प्रशांत धीरो दत्त धीरोदात्त इसी से हमारे हिंदी सिनेमा में भी नायकों की परिकल्पना की जा सकती है जहां प्रारंभ में जो नायक थे वह राम सरीखे दिखाए गए।
धीरे-धीरे नायकों का समय बदला और नायक राम से हटकर कृष्ण तक पहुंचे यानी कि जहां शुरुआत में नायकों को एक ऐसी परिपाटी के रूप में एक ऐसे चरित्र के रूप में चित्रित किया जा रहा था जो उस पूरे समाज को बदल डालेगा यह समाज में आदर्श स्थापित करेगा तो वहीं बाद में नायकों को कृष्ण के ज्यादा नज़दीक रखा गया।
यानी कि जो नायक थे वह कृष्ण की तरह प्रेम कर सकते थे अठखेलियां कर सकते थे यानी की रोमांटिक हीरो जिसमें दिलीप कुमार राजेश खन्ना जिन्हें हिन्दी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा जाता है आते हैं ।
इसके बाद एंग्री यंग मैन की भूमिका में अमिताभ बच्चन आते हैं धर्मेन्द्र आते हैं। अमिताभ बच्चन के डायलॉग लोगों की जबान पर ऐसे चढ़ जाते हैं जैसे कि वे उन्हीं की जिंदगी का हिस्सा हों ।
रोमांटिक हीरो के तौर पर शाहरुख खान को लिया जा सकता है जिन्हें मूलतः पहचान एक रोमांटिक हीरो के रूप में मिली ।
बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती है सेनोरिटा
जैसे डायलॉग उनकी पहचान बन गए इसके बाद उनकी फिल्में जो आइं हैं जिसमें उन्होंने अलग-अलग प्रकार के प्रयोग किए बाजीगर , डर जिसमें वे एक एंटी हीरो की भूमिका में नज़र आए।
शाहरुख खान के बाद दौर आता है ऋतिक रोशन का। ऋतिक रोशन जिन्होंने अपने समय के सभी नायकों को चाहे वह रोमांटिक हीरो रहे हो एंग्री यंग मैन के भीतर आ रहे हो या एंटीहीरो रहे हो सभी को इस प्रकार की चुनौती दी और वर्तमान में भी उनकी जो फिल्में हैं सुपर हीरो किस्म की वे किसी भी दूसरे हीरो पर या किसी भी दूसरे हीरो की बजट की फिल्मों पर ज्यादा भारी पड़ते हैं ।
इसके बाद दौर आता है वर्तमान फिल्मों का जिसमें की नायक की जो परिकल्पना है वह पूरी तरह से बदल जाती है। जैसे पंकज त्रिपाठी नसरुद्दीन शाह यह जो हीरो रहे जिन्होंने नायक की परिपाटी को बदल दिया वैसे इसके पीछे मुख्य कारण यह भी लिया जा सकता है कि बहुत सारे जो निर्माता है उनके पास सुविधाओं का संसाधनों का अभाव होता है तो इस कारण भी वह कुछ ऐसे कैरेक्टर्स को कुछ ऐसे कलाकारों को चुन लेते हैं जो कि भले उतना अच्छा ना दिखते हैं पर अभिनय बखूबी जानते हों।
पंकज पंकज त्रिपाठी को हम कई फिल्मों में हीरो के रूप में देखते हैं तो कहीं और विलेन के रूप में देखने में हर तरह के किरदार में फिट हो जाते हैं वर्तमान में जो हीरो है जो नायक हैं ऐसे आने लगे हैं जिन्हें आप पूरी तरह से नायक या खलनायक नहीं कह सकते हैं। वे नायक की भूमिका में भी फिट हैं और खलनायक की भूमिका में भी फिट हैं।
हिन्दी सिनेमा में नायक की परिपाटी जो बदली है उसका एक बड़ा कारण है कि वर्तमान की जो लेखन शैली है वह बदल गई है। लोगों का टेस्ट बदल गया है लोग जानते हैं कि कोई व्यक्ति पूरी तरह से न तो अच्छा हो सकता है ना पूरी तरह से खराब।
कुछ फिल्मों में लगता है कि हां यह चरित्र फिल्म का नायक है पर फिल्म के खत्म होते होते पता लगता है कि वह तो नायक नहीं खलनायक था और जिसे हमने खलनायक समझा था वह नायक निकला।
यह प्रयोग का दौर है जो हमारे हिन्दी सिनेमा में चल रहा है जिसके कारण हमें कई बेहतरीन नायक देखने को मिल रहे हैं। और यह बदलाव ott के साथ और भी जोर पकड़ता जाएगा ।
रवि शंकर सिंह
साभार डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, रवि बुले, विष्णु शंकर, गगन गेरा
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