बिजली बिल
जब से पता चला है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री माननीय अरविंद केजरीवाल जी ने दिल्ली वासियों के लिए बिजली के बिल 200 यूनिट तक माफ़ कर दिए हैं, बड़ी खुशी हुई । खुशी का आलम तो ये था कि मन हुआ घर वालों के लिए मिठाइयां लेता चलूँ।
मिठाईयाँ खरीद ही रहा था की तभी ध्यान आया कि बिल तो सरकार ने माफ़ किए हैं बिजली कंपनियों ने नहीं वे तो पैंसे लेंगी ही। पर सरकार ने माफ़ किए या कम्पनी ने क्या फर्क पड़ता है। हमें तो बिल से निज़ाद मिल गई न और क्या चाहिए ।
बिल सरकार कैसे माफ़ कर सकती है? यह सवाल पूरे रास्ते दिमाग में घूमता रहा। घर पहुुंचा तो ये बात माँ को बताई। वह हैरान हुुुई और बोली "चलो केजरीवाल ने कुुुछ तो अच्छा काम किया।"
मेरा सवाल अब भी वही था कि बिजली बिल सरकार कैसे माफ़ कर सकती है। अब मैंने बड़े भाई साहब से पूछने का निर्णय लिया और उनके कमरे में पहुंचा तो वे चाय पी रहे थे। मैंनें उन्हें बताया तो उन्होंने कहा "फायदा क्या होगा इसका लोग जो अभी तक कम बिजली खर्च कर रहे थे अब 200 यूनिट तक बिजली यूँ ही खर्च करेंगे।" मुझे इतना तो समझ आ गया कि 200 यूनिट माफ़ करना सही नहीं हुआ पर मूल प्रश्न तो जस का तस बना हुआ था। मैंने भाई साहब से पूछा कि जब घरों तक बिजली, बिजली कंपनियों द्वारा पहुंचाई जाती है तो सरकार इसे कैसे माफ़ कर सकती है? इस पर बड़े भाई साहब खूब ज़ोर से हँसे और बोले "तुझे इतना भी नहीं पता" मैंने गर्दन झुका ली मुझे ऐसे देख बड़े भाई साहब शांत हो गए और बोले "सरकार बिल माफ़ नहीं करती बल्कि हमारे बदले का बिल वह कंपनी को अदा कर देती है और हमें बिजली बिल नहीं देना पड़ता बस।" अच्छा मतलब बिल तो आएगा मगर उसे हम नहीं भरेंगे सरकार भरेगी। पर सरकार इतने पैंसे कहाँ से लाएगी? मैंने फिर पूछा । इस पर भईया फिर हँसे और बोले "सरकार पैंसे नहीं लाएगा हमने जो टेक्स भरा है उसी से वह बिल भर देगी और क्या" मतलब एक तरह से बिल तो फिर हमें ही भरना पड़ा न तो सरकार ने क्या किया? "यही तो ये सब चुनावी फंडे हैं बस और कुछ नहीं।" मैंने एक और सवाल पूछा तो सरकार को करना क्या चाहिए? "मेरे हिसाब से तो ये बिजली बिल माफ़ होने ही नहीं चाहिए क्योंकि इससे सरकार पर अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा और अतिरिक्त खर्च तो कभी भी सही नहीं होता। अगर सरकार को बिल माफ़ ही करने थे तो ज़्यादा से ज़्यादा 100 यूनिट माफ़ करते और जिसकी खपत 100 यूनिट से ज़्यादा हो यानी 101 यूनिट भी हो जाए तो उसे पूरा बिल भरना पड़े ऐसा होता तो शायद बिजली की खपत में कमी आती।"
मुझे अब समझ में आ चुका था कि ये सब केवल चुनावी हथकंडे हैं जिन्हें वोट बैंक की राजनीति के लिए प्रयोग किया जाता है। जहाँ तक रही बात बिल माफ़ करने की तो वो तो हमें ही भरना है चाहे सीधे भरो या कोई और आपसे पैंसे लेकर भरे।
मंथन
मेरा सवाल अब भी वही था कि बिजली बिल सरकार कैसे माफ़ कर सकती है। अब मैंने बड़े भाई साहब से पूछने का निर्णय लिया और उनके कमरे में पहुंचा तो वे चाय पी रहे थे। मैंनें उन्हें बताया तो उन्होंने कहा "फायदा क्या होगा इसका लोग जो अभी तक कम बिजली खर्च कर रहे थे अब 200 यूनिट तक बिजली यूँ ही खर्च करेंगे।" मुझे इतना तो समझ आ गया कि 200 यूनिट माफ़ करना सही नहीं हुआ पर मूल प्रश्न तो जस का तस बना हुआ था। मैंने भाई साहब से पूछा कि जब घरों तक बिजली, बिजली कंपनियों द्वारा पहुंचाई जाती है तो सरकार इसे कैसे माफ़ कर सकती है? इस पर बड़े भाई साहब खूब ज़ोर से हँसे और बोले "तुझे इतना भी नहीं पता" मैंने गर्दन झुका ली मुझे ऐसे देख बड़े भाई साहब शांत हो गए और बोले "सरकार बिल माफ़ नहीं करती बल्कि हमारे बदले का बिल वह कंपनी को अदा कर देती है और हमें बिजली बिल नहीं देना पड़ता बस।" अच्छा मतलब बिल तो आएगा मगर उसे हम नहीं भरेंगे सरकार भरेगी। पर सरकार इतने पैंसे कहाँ से लाएगी? मैंने फिर पूछा । इस पर भईया फिर हँसे और बोले "सरकार पैंसे नहीं लाएगा हमने जो टेक्स भरा है उसी से वह बिल भर देगी और क्या" मतलब एक तरह से बिल तो फिर हमें ही भरना पड़ा न तो सरकार ने क्या किया? "यही तो ये सब चुनावी फंडे हैं बस और कुछ नहीं।" मैंने एक और सवाल पूछा तो सरकार को करना क्या चाहिए? "मेरे हिसाब से तो ये बिजली बिल माफ़ होने ही नहीं चाहिए क्योंकि इससे सरकार पर अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा और अतिरिक्त खर्च तो कभी भी सही नहीं होता। अगर सरकार को बिल माफ़ ही करने थे तो ज़्यादा से ज़्यादा 100 यूनिट माफ़ करते और जिसकी खपत 100 यूनिट से ज़्यादा हो यानी 101 यूनिट भी हो जाए तो उसे पूरा बिल भरना पड़े ऐसा होता तो शायद बिजली की खपत में कमी आती।"
मुझे अब समझ में आ चुका था कि ये सब केवल चुनावी हथकंडे हैं जिन्हें वोट बैंक की राजनीति के लिए प्रयोग किया जाता है। जहाँ तक रही बात बिल माफ़ करने की तो वो तो हमें ही भरना है चाहे सीधे भरो या कोई और आपसे पैंसे लेकर भरे।
मंथन
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