ग्रीन पटाखे और दिवाली
दिवाली या दीपोत्सव यूँ तो दिए और प्रकाश का त्योहार है, मगर बिना शोर-शराबे के किसे आनन्द आता है। कुछ वर्ष पूर्व तक अगर मुझसे भी पूछा जाता तो शायद में भी वही जवाब देता जो आज बच्चे देते हैं। जाने क्यों समय के साथ साथ पटाखे से इतनी दूरी होती गई शायद प्रदूषण के विषय में ज़्यादा चिंतित हो गया होऊंगा।
कल रात जब अपनी आदत के अनुसार रात को पढ़ने बैठा तो न पढ़ पाया न सो पाया। देर रात एक बजे तक इन्तज़ार किया कि शायद पटाखों और DJ का शोर कम हो जाए पर दिवाली की रात थी न कोई कहाँ समझने वाला था। ऊपर से सब अपने ही हैं मना किसे करें?
इस बार यही सोंचा था कि रात को शांति से पढूंगा और हो सकता है इस बार दिवाली की रात नींद भी अच्छी आए। पर हर साल की तरह इस साल भी शोर अपने शबाब पर ही रहा।
इस बार सरकार ने ग्रीन पटाखों का नया विषय प्रस्तुत किया, कितनी ही फैक्ट्रियों को बंद किया, लोगों से अपील की, मगर परिणाम वही। जाने क्यों या तो लोग नहीं समझते या शायद सरकार फैसले नहीं ले पा रही है।
ग्रीन पटाखे तो मुझे नितांत फूहड़ता ही लगती है। माना की उनसे धुऐं में कमी हो जाएगी पर शोर का क्या? क्या ग्रीन पटाखे शोर भी कम करेंगें? या किसी और तरीके से इसे कम किया जाएगा। सारा प्रदूषण पटाखों के धुंए से ही होता है क्या? उसके शोर से कोई प्रदूषण नहीं होता क्या? आज भी कितने ही लोग पटाखे फोड़ रहे हैं। घर के भीतर तक बारूद की महक आ रही है और अचानक होने वाली आवाज़ तो डरा देती है। मानो कहीं कोई दुर्घटना ही हो गई हो। खैर लोगों का क्या है साल में एक से दो ही दिन तो पटाखे फोड़ते हैं शेष तो जीत की खुशी में फोड़े जाते हैं।
कल रात जब अपनी आदत के अनुसार रात को पढ़ने बैठा तो न पढ़ पाया न सो पाया। देर रात एक बजे तक इन्तज़ार किया कि शायद पटाखों और DJ का शोर कम हो जाए पर दिवाली की रात थी न कोई कहाँ समझने वाला था। ऊपर से सब अपने ही हैं मना किसे करें?
इस बार यही सोंचा था कि रात को शांति से पढूंगा और हो सकता है इस बार दिवाली की रात नींद भी अच्छी आए। पर हर साल की तरह इस साल भी शोर अपने शबाब पर ही रहा।
इस बार सरकार ने ग्रीन पटाखों का नया विषय प्रस्तुत किया, कितनी ही फैक्ट्रियों को बंद किया, लोगों से अपील की, मगर परिणाम वही। जाने क्यों या तो लोग नहीं समझते या शायद सरकार फैसले नहीं ले पा रही है।
ग्रीन पटाखे तो मुझे नितांत फूहड़ता ही लगती है। माना की उनसे धुऐं में कमी हो जाएगी पर शोर का क्या? क्या ग्रीन पटाखे शोर भी कम करेंगें? या किसी और तरीके से इसे कम किया जाएगा। सारा प्रदूषण पटाखों के धुंए से ही होता है क्या? उसके शोर से कोई प्रदूषण नहीं होता क्या? आज भी कितने ही लोग पटाखे फोड़ रहे हैं। घर के भीतर तक बारूद की महक आ रही है और अचानक होने वाली आवाज़ तो डरा देती है। मानो कहीं कोई दुर्घटना ही हो गई हो। खैर लोगों का क्या है साल में एक से दो ही दिन तो पटाखे फोड़ते हैं शेष तो जीत की खुशी में फोड़े जाते हैं।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'