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Monday, June 14, 2021

काव्य संध्या

 काव्य संध्या


स्पोर्ट्स इकोनॉमिक्स एंड वेब जर्नलिज्म एसजीटीबी खालसा कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय एलुमनाई और स्पोर्ट्स क्रीड़ा के संयुक्त प्रयास से इस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका संचालन आदरणीय ओम निश्चल जी कर रहे थे और अध्यक्षता आदरणीय गुरुवार रामदरश मिश्र जी।

दिल्ली के आशीष कुमार दिलदार से यह काव्य संध्या प्रारंभ हुई । दिलदार साहब ने अपने गुरुजनों को अपने एक मुक्तक में याद किया फिर संध्या की सही सही शुरुआत अपने तीखे व्यंग्य पूर्ण मुक्तकों और गजलों से किया।

इसके बाद बिहार की भावना शेखर ने अपनी कविताओं की शुरुआत ‘जूते के फीते’ से की जिसमें उन्होंने समाज के एक ऐसे वर्ग को प्रतिकात्मक रूप से व्यंजित किया जिसकी अवहेलना सदियों से हो रही है। इसके बाद प्रकृति और मानव संवेदनाओं का जो चित्रा भावना शेखर जी ने प्रस्तुत किया उसे कोई भुला नहीं सकता। 

मुंबई के प्रेम रंजन अनिमेष की कविता छाता एक ऐसे वर्ग बल्कि यूं कहें उन व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करती है जी अपना घर बनाने की चाह में जीते हैं और मार जाते हैं पर घर नहीं बना पाते। अपनी कविता चिट्ठी के माध्यम से उन्होंने न केवल प्रेम बल्कि मानव मन और उसमें चल रही उहापोह का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया। ओम जी के आग्रह पर एक गीत बाबुल ये किस देश बियाह का सास्वर वचन कर सभी की आंखे नम कर दीं।

पांडिचेरी की सवर्ण ज्योति ने अपनी छोटी किंतु मार्मिक कविताओं से सभी को भाव विभोर कर दिया। इतिहास की तमाम नारियों का चित्रण करते हुए उनकी कविता ‘मैं मैं ही रहूंगी’ उनके काव्यपाठ का विशेष आकर्षण बनी।

ओम निश्चल जी के गीत ने उस समय गोष्ठी को प्राण दिए जब गोष्ठी अध्यक्ष यानी रामदरश मिश्र जी तकनीकी कारणों से काव्य पाठ नहीं कर पा रहे थे। ओम निश्चल जी के गीत की जितनी तारीफ की जाए कम है उस पर उनका स्वर कविताओं में भी प्राण फूकने वाला होता है।

इस बीच आदरणीय गुरुवार रामदरश मिश्र जी की तकनीकी समस्या का निदान हुआ और हम सभी काव्य रसिक उनके मधुर स्वर को सुन पाए। एक सदी को अपने में समेटे रामदरश मिश्र जी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण उन्हें कम कविताएं पढ़ने को कहा गया किंतु जब सदा नीरा बहती है तो अंतिम छोर की प्राप्ति करती अवश्य है सो रामदरश मिश्र जी ने भी अपने काव्य पाठ में कोरोना, उसकी विभीषिका और उसके प्रचंड रूप को भली प्रकार अपनी कविताओं में उकेरा। साथ ही बेटी की घर अगमानी पर जो सजीव चित्र प्रस्तुत किया उसे कोई भुला नहीं सकता ।

संध्या के अंत में ओम निश्चल और डॉ स्मिता मिश्रा ने देश के कोने कोने से उपस्थित सभी कवियों और काव्य रसिकों का आभार ज्ञापन किया और पुनः अगले रविवार भेंट का वादा लिए सभी विदा हुए।

रवि शंकर सिंह

वीडियो देखने के लिए लिंक को क्लिक करें।

https://youtu.be/jjI2QPFKTds




हिन्दी सिनेमा में नायक की संकल्पना

 हिन्दी सिनेमा में नायक की संकल्पना


संस्कृत नाट्य शास्त्रों में चार प्रकार के नायकों का जिक्र है धीर ललित धीर प्रशांत धीरो दत्त धीरोदात्त इसी से हमारे हिंदी सिनेमा में भी नायकों की परिकल्पना की जा सकती है जहां प्रारंभ में जो नायक थे वह राम सरीखे दिखाए गए।

धीरे-धीरे नायकों का समय बदला और नायक राम से हटकर कृष्ण तक पहुंचे यानी कि जहां शुरुआत में नायकों को एक ऐसी परिपाटी के रूप में एक ऐसे चरित्र के रूप में चित्रित किया जा रहा था जो उस पूरे समाज को बदल डालेगा यह समाज में आदर्श स्थापित करेगा तो वहीं बाद में नायकों को कृष्ण के ज्यादा नज़दीक रखा गया।

यानी कि जो नायक थे वह कृष्ण की तरह प्रेम कर सकते थे अठखेलियां कर सकते थे यानी की रोमांटिक हीरो जिसमें दिलीप कुमार राजेश खन्ना जिन्हें हिन्दी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा जाता है आते हैं ।

इसके बाद एंग्री यंग मैन की भूमिका में अमिताभ बच्चन आते हैं धर्मेन्द्र आते हैं। अमिताभ बच्चन के डायलॉग लोगों की जबान पर ऐसे चढ़ जाते हैं जैसे कि वे उन्हीं की जिंदगी का हिस्सा हों ।
रोमांटिक हीरो के तौर पर शाहरुख खान को लिया जा सकता है जिन्हें मूलतः पहचान एक रोमांटिक हीरो के रूप में मिली ।

बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती है सेनोरिटा
जैसे डायलॉग उनकी पहचान बन गए इसके बाद उनकी फिल्में जो आइं हैं जिसमें उन्होंने अलग-अलग प्रकार के प्रयोग किए बाजीगर , डर जिसमें वे एक एंटी हीरो की भूमिका में नज़र आए।

शाहरुख खान के बाद दौर आता है ऋतिक रोशन का। ऋतिक रोशन जिन्होंने अपने समय के सभी नायकों को चाहे वह रोमांटिक हीरो रहे हो एंग्री यंग मैन के भीतर आ रहे हो या एंटीहीरो रहे हो सभी को इस प्रकार की चुनौती दी और वर्तमान में भी उनकी जो फिल्में हैं सुपर हीरो किस्म की वे किसी भी दूसरे हीरो पर या किसी भी दूसरे हीरो की बजट की फिल्मों पर ज्यादा भारी पड़ते हैं ।

इसके बाद दौर आता है वर्तमान फिल्मों का जिसमें की नायक की जो परिकल्पना है वह पूरी तरह से बदल जाती है। जैसे पंकज त्रिपाठी नसरुद्दीन शाह यह जो हीरो रहे जिन्होंने नायक की परिपाटी को बदल दिया वैसे इसके पीछे मुख्य कारण यह भी लिया जा सकता है कि बहुत सारे जो निर्माता है उनके पास सुविधाओं का संसाधनों का अभाव होता है तो इस कारण भी वह कुछ ऐसे कैरेक्टर्स को कुछ ऐसे कलाकारों को चुन लेते हैं जो कि भले उतना अच्छा ना दिखते हैं पर अभिनय बखूबी जानते हों।

पंकज पंकज त्रिपाठी को हम कई फिल्मों में हीरो के रूप में देखते हैं तो कहीं और विलेन के रूप में देखने में हर तरह के किरदार में फिट हो जाते हैं वर्तमान में जो हीरो है जो नायक हैं ऐसे आने लगे हैं जिन्हें आप पूरी तरह से नायक या खलनायक नहीं कह सकते हैं। वे नायक की भूमिका में भी फिट हैं और खलनायक की भूमिका में भी फिट हैं।

हिन्दी सिनेमा में नायक की परिपाटी जो बदली है उसका एक बड़ा कारण है कि वर्तमान की जो लेखन शैली है वह बदल गई है। लोगों का टेस्ट बदल गया है लोग जानते हैं कि कोई व्यक्ति पूरी तरह से न तो अच्छा हो सकता है ना पूरी तरह से खराब।
कुछ फिल्मों में लगता है कि हां यह चरित्र फिल्म का नायक है पर फिल्म के खत्म होते होते पता लगता है कि वह तो नायक नहीं खलनायक था और जिसे हमने खलनायक समझा था वह नायक निकला।

यह प्रयोग का दौर है जो हमारे हिन्दी सिनेमा में चल रहा है जिसके कारण हमें कई बेहतरीन नायक देखने को मिल रहे हैं। और यह बदलाव ott के साथ और भी जोर पकड़ता जाएगा ।

रवि शंकर सिंह

साभार डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, रवि बुले, विष्णु शंकर, गगन गेरा