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Monday, June 14, 2021

काव्य संध्या

 काव्य संध्या


स्पोर्ट्स इकोनॉमिक्स एंड वेब जर्नलिज्म एसजीटीबी खालसा कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय एलुमनाई और स्पोर्ट्स क्रीड़ा के संयुक्त प्रयास से इस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका संचालन आदरणीय ओम निश्चल जी कर रहे थे और अध्यक्षता आदरणीय गुरुवार रामदरश मिश्र जी।

दिल्ली के आशीष कुमार दिलदार से यह काव्य संध्या प्रारंभ हुई । दिलदार साहब ने अपने गुरुजनों को अपने एक मुक्तक में याद किया फिर संध्या की सही सही शुरुआत अपने तीखे व्यंग्य पूर्ण मुक्तकों और गजलों से किया।

इसके बाद बिहार की भावना शेखर ने अपनी कविताओं की शुरुआत ‘जूते के फीते’ से की जिसमें उन्होंने समाज के एक ऐसे वर्ग को प्रतिकात्मक रूप से व्यंजित किया जिसकी अवहेलना सदियों से हो रही है। इसके बाद प्रकृति और मानव संवेदनाओं का जो चित्रा भावना शेखर जी ने प्रस्तुत किया उसे कोई भुला नहीं सकता। 

मुंबई के प्रेम रंजन अनिमेष की कविता छाता एक ऐसे वर्ग बल्कि यूं कहें उन व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करती है जी अपना घर बनाने की चाह में जीते हैं और मार जाते हैं पर घर नहीं बना पाते। अपनी कविता चिट्ठी के माध्यम से उन्होंने न केवल प्रेम बल्कि मानव मन और उसमें चल रही उहापोह का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया। ओम जी के आग्रह पर एक गीत बाबुल ये किस देश बियाह का सास्वर वचन कर सभी की आंखे नम कर दीं।

पांडिचेरी की सवर्ण ज्योति ने अपनी छोटी किंतु मार्मिक कविताओं से सभी को भाव विभोर कर दिया। इतिहास की तमाम नारियों का चित्रण करते हुए उनकी कविता ‘मैं मैं ही रहूंगी’ उनके काव्यपाठ का विशेष आकर्षण बनी।

ओम निश्चल जी के गीत ने उस समय गोष्ठी को प्राण दिए जब गोष्ठी अध्यक्ष यानी रामदरश मिश्र जी तकनीकी कारणों से काव्य पाठ नहीं कर पा रहे थे। ओम निश्चल जी के गीत की जितनी तारीफ की जाए कम है उस पर उनका स्वर कविताओं में भी प्राण फूकने वाला होता है।

इस बीच आदरणीय गुरुवार रामदरश मिश्र जी की तकनीकी समस्या का निदान हुआ और हम सभी काव्य रसिक उनके मधुर स्वर को सुन पाए। एक सदी को अपने में समेटे रामदरश मिश्र जी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण उन्हें कम कविताएं पढ़ने को कहा गया किंतु जब सदा नीरा बहती है तो अंतिम छोर की प्राप्ति करती अवश्य है सो रामदरश मिश्र जी ने भी अपने काव्य पाठ में कोरोना, उसकी विभीषिका और उसके प्रचंड रूप को भली प्रकार अपनी कविताओं में उकेरा। साथ ही बेटी की घर अगमानी पर जो सजीव चित्र प्रस्तुत किया उसे कोई भुला नहीं सकता ।

संध्या के अंत में ओम निश्चल और डॉ स्मिता मिश्रा ने देश के कोने कोने से उपस्थित सभी कवियों और काव्य रसिकों का आभार ज्ञापन किया और पुनः अगले रविवार भेंट का वादा लिए सभी विदा हुए।

रवि शंकर सिंह

वीडियो देखने के लिए लिंक को क्लिक करें।

https://youtu.be/jjI2QPFKTds




हिन्दी सिनेमा में नायक की संकल्पना

 हिन्दी सिनेमा में नायक की संकल्पना


संस्कृत नाट्य शास्त्रों में चार प्रकार के नायकों का जिक्र है धीर ललित धीर प्रशांत धीरो दत्त धीरोदात्त इसी से हमारे हिंदी सिनेमा में भी नायकों की परिकल्पना की जा सकती है जहां प्रारंभ में जो नायक थे वह राम सरीखे दिखाए गए।

धीरे-धीरे नायकों का समय बदला और नायक राम से हटकर कृष्ण तक पहुंचे यानी कि जहां शुरुआत में नायकों को एक ऐसी परिपाटी के रूप में एक ऐसे चरित्र के रूप में चित्रित किया जा रहा था जो उस पूरे समाज को बदल डालेगा यह समाज में आदर्श स्थापित करेगा तो वहीं बाद में नायकों को कृष्ण के ज्यादा नज़दीक रखा गया।

यानी कि जो नायक थे वह कृष्ण की तरह प्रेम कर सकते थे अठखेलियां कर सकते थे यानी की रोमांटिक हीरो जिसमें दिलीप कुमार राजेश खन्ना जिन्हें हिन्दी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा जाता है आते हैं ।

इसके बाद एंग्री यंग मैन की भूमिका में अमिताभ बच्चन आते हैं धर्मेन्द्र आते हैं। अमिताभ बच्चन के डायलॉग लोगों की जबान पर ऐसे चढ़ जाते हैं जैसे कि वे उन्हीं की जिंदगी का हिस्सा हों ।
रोमांटिक हीरो के तौर पर शाहरुख खान को लिया जा सकता है जिन्हें मूलतः पहचान एक रोमांटिक हीरो के रूप में मिली ।

बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती है सेनोरिटा
जैसे डायलॉग उनकी पहचान बन गए इसके बाद उनकी फिल्में जो आइं हैं जिसमें उन्होंने अलग-अलग प्रकार के प्रयोग किए बाजीगर , डर जिसमें वे एक एंटी हीरो की भूमिका में नज़र आए।

शाहरुख खान के बाद दौर आता है ऋतिक रोशन का। ऋतिक रोशन जिन्होंने अपने समय के सभी नायकों को चाहे वह रोमांटिक हीरो रहे हो एंग्री यंग मैन के भीतर आ रहे हो या एंटीहीरो रहे हो सभी को इस प्रकार की चुनौती दी और वर्तमान में भी उनकी जो फिल्में हैं सुपर हीरो किस्म की वे किसी भी दूसरे हीरो पर या किसी भी दूसरे हीरो की बजट की फिल्मों पर ज्यादा भारी पड़ते हैं ।

इसके बाद दौर आता है वर्तमान फिल्मों का जिसमें की नायक की जो परिकल्पना है वह पूरी तरह से बदल जाती है। जैसे पंकज त्रिपाठी नसरुद्दीन शाह यह जो हीरो रहे जिन्होंने नायक की परिपाटी को बदल दिया वैसे इसके पीछे मुख्य कारण यह भी लिया जा सकता है कि बहुत सारे जो निर्माता है उनके पास सुविधाओं का संसाधनों का अभाव होता है तो इस कारण भी वह कुछ ऐसे कैरेक्टर्स को कुछ ऐसे कलाकारों को चुन लेते हैं जो कि भले उतना अच्छा ना दिखते हैं पर अभिनय बखूबी जानते हों।

पंकज पंकज त्रिपाठी को हम कई फिल्मों में हीरो के रूप में देखते हैं तो कहीं और विलेन के रूप में देखने में हर तरह के किरदार में फिट हो जाते हैं वर्तमान में जो हीरो है जो नायक हैं ऐसे आने लगे हैं जिन्हें आप पूरी तरह से नायक या खलनायक नहीं कह सकते हैं। वे नायक की भूमिका में भी फिट हैं और खलनायक की भूमिका में भी फिट हैं।

हिन्दी सिनेमा में नायक की परिपाटी जो बदली है उसका एक बड़ा कारण है कि वर्तमान की जो लेखन शैली है वह बदल गई है। लोगों का टेस्ट बदल गया है लोग जानते हैं कि कोई व्यक्ति पूरी तरह से न तो अच्छा हो सकता है ना पूरी तरह से खराब।
कुछ फिल्मों में लगता है कि हां यह चरित्र फिल्म का नायक है पर फिल्म के खत्म होते होते पता लगता है कि वह तो नायक नहीं खलनायक था और जिसे हमने खलनायक समझा था वह नायक निकला।

यह प्रयोग का दौर है जो हमारे हिन्दी सिनेमा में चल रहा है जिसके कारण हमें कई बेहतरीन नायक देखने को मिल रहे हैं। और यह बदलाव ott के साथ और भी जोर पकड़ता जाएगा ।

रवि शंकर सिंह

साभार डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, रवि बुले, विष्णु शंकर, गगन गेरा

Tuesday, March 23, 2021

फुटबॉल

 फुटबॉल


फुटबॉल दुनियां का सबसे ज्यादा खेला या पसंद किया जाने वाला खेल है । एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनियां की लगभग 4 प्रतिशत जनसंख्या नियमित या संगठनात्मक रूप से फुटबॉल खेलती है और स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था भारतीयों को फुटबॉल खेलना चाहिए । स्वास्थ्य की दृष्टि से यह खेल अत्यंत महत्वपूर्ण है ।


FIFA जो फुटबॉल की विश्वस्तरीय संस्था है के सदस्य देशों की संख्या 211 है जो की UNO के सदस्य देशों की कुल संख्या से भी अधिक है । यह इस बात को प्रमाणित करता है की फुटबॉल की लोकप्रियता क्रिकेट जैसे प्रसिद्ध खेल से भी अधिक है ।


फुटबॉल का नामकरण


फुटबॉल के विषय में एक तथ्य जानना अत्यंत जरूरी है कि आखिर इस खेल का नाम फुटबॉल कैसे पड़ा । फुटबॉल शब्द की उत्पत्ति के बारे में लोगों की अलग-अलग राय है । इस विषय में कोई लिखित ऐतिहासिक साक्ष्य तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन कदाचित पैर से गेंद को मारने के कारण ही इसे फुटबॉल कहा  गया । 


फीफा के अनुसार फुटबॉल एक चीनी खेल सुजु का विकसित रूप है यानी कि चीन में जो इस तरह का ही खेल खेला जाता था उसे सुजु कहा जाता था । इसके अलावा इसे जापान में असुका, अमेरिका में सोकर, और मिश्र में हरपास्टीन नाम से भी जाना जाता रहा है ।


ब्रिटेन के राजकुमार हेनरी चतुर्थ ने 1408 ई. में फुटबॉल शब्द का इस्तेमाल अंग्रेजी में किया था । इसके साथ ही लैटिन में भी इसका एक विस्तृत इतिहास रहा है । इसके अतिरिक्त 1586 ई० में यह जॉन डेविस नाम के एक समुद्री जहाज के कप्तान के कार्यकर्ताओं द्वारा ग्रीन लैंड में फुटबॉल नाम से खेला गया । संभवतः तभी से यही नाम इस खेल के लिए रूढ़ हो गया । 15 वीं शताब्दी में फुटबॉल नाम से ही ये खेल स्कॉटलैंड में खेला गया । यानी कि फुटबॉल खेला तो बहुत पहले से ज्यादा था लेकिन अलग-अलग देश में अलग-अलग नाम से जाना जाता था ।


फुटबॉल का इतिहास


फुटबॉल का इतिहास करीब 300 ईसा पूर्व तक जाता है । फुटबॉल खेल की शुरुआत चीन से मानी जाती है । फीफा भी इसी को स्वीकृत करता है । चीन में यह खेल सैन्य अभ्यास के लिए खेला जाता था । ‘हान’ राजवंश में इस खेल के अग्रदूत को ‘त्सू चू’ कहा जाता था जो एक चमड़े की गेंद को लात मार कर खेल की शुरुआत करता था जिसमें पंख आदि भरे रहते थे । ( यह वर्तमान रेफरी की ही तरह लगता है जैसे आज रेफरी खेल की शुरुआत के लिए गेंद को उच्छलता है । ) गेंद की गोलाई 30-40 सेंटीमीटर होती थी तथा एक बांस का जाल भी इस खेल में प्रयोग में लाया जाता था ।  इस खेल को खेलने के दौरान पैर, छाती, पीठ और कंधे आदि का प्रयोग किया जाता है । इसी कारण इसे फुटबॉल का निकट पूर्वज कहा जाता है ।


चीन के बाद 500-600 वर्ष बाद जापान में ‘केमारी’ नाम का खेल प्रचलित हुआ । इस खेल में त्सू चू की उपलब्धता नहीं होती थी । इस खेल में एक गोल घेरे में खिलाड़ी खड़े होकर एक दूसरे की तरफ गेंद भेजने का काम करते थे । यह खेल आज भी खेला जाता है ।


प्राचीन यूनान में ‘हार्पास्टीन’ नाम का खेल था जिसे दो गुटों द्वारा खेला जाता था । इस खेल में गेंद का आकार छोटा होता था । यह खेल एक आयताकार घेरे में खेला जाता था । यह 700-800 साल तक प्रचालन में रहा था ।
9 वी से 13वी शताब्दी के मध्य इस खेल में खिलाड़ियों की संख्या निश्चित नहीं थी । न विशेष तौर पर किसी नियम का ही पता इस समय तक लगता है । कई बार तो 100 से भी अधिक खिलाड़ी इसमें खेलने आ जाते थे । इसमें हाथ - पैर के साथ ही साथ लाठी डंडों का भी प्रयोग होता था । जिसके कारण काफी लोग हताहत भी होते थे यही कारण है की 1314 ई. में एडवर्ड द्वितीय ने इस खेल पर रोक लगा दी थी । इस दौरान यदि कोई भी फुटबॉल खेलता पाया जाता तो उसे 7 वर्ष की जेल हो जाती थी । इस प्रतिबंध को एलिजाबेथ प्रथम ने भी जारी रखा था ।


पंद्रहवीं सदी में फुटबॉल नाम का ही एक खेल स्कॉटलैंड में खेला जाता था, जहा इसे 1424 ई में फुटबॉल एक्ट के अंतर्गत प्रतिबंधित  कर दिया गया था । हालाँकि यह प्रतिबन्ध जल्द ही हटा लिया गया, लेकिन तब तक लोगों में इस खेल की रूचि समाप्त हो गयी थी और एक लम्बे समय के बाद उन्नीसवीं शताब्दी में इसका पुनर्जन्म देखने मिलता है । हालाँकि इस दौरान कई अन्य स्थानों पर यह खेला जा रहा था। 


इसके बाद 1526 इंग्लैंड के राजा किन हेनरी अष्टम ने फुटबॉल खेलने में रुचि जताई और एक विशेष प्रकार का जूता बनवाया । 1580 में सर फिलिप सिडनी नेे एक कविता में महिलाओं द्वारा फुटबॉल खेल का वर्णन किया  है । 


आधुनिक दुनिया में इस खेल का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा। इस खेल के पहले क्लबों (Clubs) की शुरुआत 15वीं शताब्दी में हुयी थी लेकिन ये क्लब किसी भी प्रकार से एकत्रित नहीं थे तथा उनका कोई कार्यालय नहीं हुआ करता था। इस कारण बिना किसी कागज़ात की उपलब्धता के यह निश्चित करना लगभग असंभव सा हो जाता है कि प्राचीनतम क्लब कौन सा था ?


16 वीं शताब्दी के अंत में 17वीं शताब्दी के आरंभ में पहली बार फुटबॉल खेल के मुकाबले की भावना को लाने के लिए गोल की धारणा का विकास हुआ । खिलाड़ियों ने मैदान में दो विपरीत शीर्ष में झाड़िया लगाकर गोलपोस्ट का निर्माण किया । 17 वीं शताब्दी के दौरान 8 या 12 गोल का एक मैच खेला जाता था ।


19वीं शताब्दी में व्यापक रूप से फुटबॉल के विभिन्न रूप के साथ इंग्लैंड के पब्लिक स्कूलों में खेला गया था । इतिहासकारों की मानें तो फुटबॉल क्लब की शुरुआत 1824 में एडिबर्ग में हुई थी । शुरुआत में फुटबॉल क्लब विद्यार्थियों द्वारा बनाया जाता था । उन्हीं में से एक शेफील्ड फुटबॉल क्लब है जो एक अंग्रेजी फुटबॉल क्लब है । इसकी स्थापना 24 अक्टूबर 1857 में हुई थी । यह दुनिया का सबसे पुराना सक्रिय फुटबॉल क्लब है जो आज भी अस्तित्व में है । सबसे पुराना पेशेवर फुटबॉल क्लब था अंग्रेज़ी क्लब नोट्स काउंटी जो कि 1862 में बना था और यह आज भी मौजूद है । धीरे-धीरे इस खेल का फैलाव शुरू होना चालू हो गया और एक समय के बाद व्यापारियों ने इसमें अपनी रूचि दिखाना शुरू कर दिया।


1815 इटर्न कॉलेज ने पहली बार इस खेल के लिए नियम बनाए । 1863 में पहली फेडरेशन लंदन फुटबॉल असोशियाश की स्थापना के साथ ही नियमों के बनने का सिलसिला विधिवत रूप से प्रारंभ हो गया । इसी वर्ष पहला सार्वजनिक नियम भी बनाया गया । बाद में कुछ और फेडरेशन तथा क्लबों ने इसके नियमों को मानने से इंकार कर दिया।  इसके बाद 1886 में फिर से इसके लिए नियमों को बनाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ ।


फुटबॉल का पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के मध्य 30 नवंबर 1872 में ग्लासगो में खेला गया जो बेनतीजा रहा यानी दोनों ही टीमें गोल नहीं कर पाई । इस खेल को देखने के लिए 4000 लोग आए थे । 1883 में दुनिया का पहला बहुदलीय अंतर्राष्ट्रीय मुकाबला खेला गया जिसमें आयरलैंड, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स की टीमों ने भाग लिया था । इस तरह से फुटबॉल इंग्लैंड में फला फूला और जल्द ही पूरे यूरोपीय महाद्वीप में फैल गया । यूरोप के बाहर ये खेल सबसे पहले अर्जेंटीना में 1862 में खेला गया था । पहली लीग प्रतियोगिता की शुरुआत 1888 में इंग्लैंड में हुई ।


FIFA



20 वीं सदी में खेल को एक ऐसी संस्था की आवश्यकता होने लगी, जो इसकी देखभाल नियमित रूप से कर सके । इंग्लिश फुटबॉल एसोसिएशन की तरफ से कई ऐसी सभाएं आयोजित की गयीं जहाँ से एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की संस्था का निर्माण किया जा सके । फलस्वरूप यूरोप के सात बड़े देश फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, नीदरलैंड, स्पेन, स्वीडन और स्विटज़रलैंड ने मिलकर 21 मई 1904 में ‘फेडरेशन इंटरनेशनल ऑफ़ फुटबॉल एसोसिएशन’ (FIFA) की स्थापना फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुई जिसका मुख्यालय ज्यूरिक स्विट्जरलैंड में स्थापित किया गया । जिसके पहले अध्यक्ष के रूप में रोबर्ट गुएरिन को नियुक्त किया गया था । इंग्लैंड और अन्य ब्रिटिश देश शुरुआत से फीफा में शामिल नहीं हुए । कालान्तर में ये फीफा में शामिल हुए लेकिन सन 1950 तक वे इस विश्व कप में हिस्सा नहीं ले पाये । तब से लेकर आज तक यह खेल अनेकों फेर बदल से गुजरा और यह खेल एक जूनून बन गया । दुनिया के सबसे कठिन खेलों में फुटबॉल को जाना जाता है तथा इस खेल में प्रत्येक खिलाड़ी की महत्ता मायने रखती है ।



संदर्भ :–


1. https://goo.gl/5sVMKj
2. https://www.fifa.com/about-fifa/who-we-are/the-game/index.html
3. https://www.footballhistory.org/
4. https://kaiseinhindi.com/football-ka-itihas-in-hindi/



Monday, October 28, 2019

ग्रीन पटाखे और दिवाली

 ग्रीन पटाखे और दिवाली

दिवाली या दीपोत्सव यूँ तो दिए और प्रकाश का त्योहार है, मगर बिना शोर-शराबे के किसे आनन्द आता है। कुछ वर्ष पूर्व तक अगर मुझसे भी पूछा जाता तो शायद में भी वही जवाब देता जो आज बच्चे देते हैं। जाने क्यों समय के साथ साथ पटाखे से इतनी दूरी होती गई शायद प्रदूषण के विषय में ज़्यादा चिंतित हो गया होऊंगा।

कल रात जब अपनी आदत के अनुसार रात को पढ़ने बैठा तो न पढ़ पाया न सो पाया। देर रात एक बजे तक इन्तज़ार किया कि शायद पटाखों और DJ का शोर कम हो जाए पर दिवाली की रात थी न कोई कहाँ समझने वाला था। ऊपर से सब अपने ही हैं मना किसे करें?

इस बार यही सोंचा था कि रात को शांति से पढूंगा और हो सकता है इस बार दिवाली की रात नींद भी अच्छी आए। पर हर साल की तरह इस साल भी शोर अपने शबाब पर ही रहा।

इस बार सरकार ने ग्रीन पटाखों का नया विषय प्रस्तुत किया, कितनी ही फैक्ट्रियों को बंद किया, लोगों से अपील की, मगर परिणाम वही। जाने क्यों या तो लोग नहीं समझते या शायद सरकार फैसले नहीं ले पा रही है।

ग्रीन पटाखे तो मुझे नितांत फूहड़ता ही लगती है। माना की उनसे धुऐं में कमी हो जाएगी पर शोर का क्या? क्या ग्रीन पटाखे शोर भी कम करेंगें?  या किसी और तरीके से इसे कम किया जाएगा। सारा प्रदूषण पटाखों के धुंए से ही होता है क्या? उसके शोर से कोई प्रदूषण नहीं होता क्या? आज भी कितने ही लोग पटाखे फोड़ रहे हैं। घर के भीतर तक बारूद की महक आ रही है और अचानक होने वाली आवाज़ तो डरा देती है। मानो  कहीं कोई दुर्घटना ही हो गई हो। खैर लोगों का क्या है साल में एक से दो ही दिन तो पटाखे फोड़ते हैं शेष तो जीत की खुशी में फोड़े जाते हैं।

रवि शंकर सिंह

'मंथन'


Sunday, September 29, 2019

बिजली बिल

       बिजली बिल   

जब से पता चला है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री माननीय अरविंद केजरीवाल जी ने दिल्ली वासियों के लिए बिजली के बिल 200 यूनिट तक माफ़ कर दिए हैं, बड़ी खुशी हुई । खुशी का आलम तो ये था कि मन हुआ घर वालों के लिए मिठाइयां लेता चलूँ। 

मिठाईयाँ खरीद ही रहा था की तभी ध्यान आया कि बिल तो सरकार ने माफ़ किए हैं बिजली कंपनियों ने नहीं वे तो पैंसे लेंगी ही। पर सरकार ने माफ़ किए या कम्पनी ने क्या फर्क पड़ता है। हमें तो बिल से निज़ाद मिल गई न और क्या चाहिए ।

बिल सरकार कैसे माफ़ कर सकती है? यह सवाल पूरे रास्ते दिमाग में घूमता रहा। घर पहुुंचा तो ये  बात माँ को बताई। वह हैरान हुुुई और बोली "चलो केजरीवाल ने  कुुुछ तो  अच्छा  काम किया।" 

मेरा सवाल अब भी वही था कि बिजली बिल सरकार कैसे माफ़ कर सकती है। अब मैंने बड़े भाई साहब से पूछने का निर्णय लिया और उनके कमरे में पहुंचा तो वे चाय पी रहे थे। मैंनें उन्हें बताया तो उन्होंने कहा "फायदा क्या होगा इसका लोग जो अभी तक कम बिजली खर्च कर रहे थे अब 200 यूनिट तक बिजली यूँ ही खर्च करेंगे।" मुझे इतना तो समझ आ गया कि 200 यूनिट माफ़ करना सही नहीं हुआ पर मूल प्रश्न तो जस का तस बना हुआ था। मैंने भाई साहब से पूछा कि जब घरों तक बिजली, बिजली कंपनियों द्वारा पहुंचाई जाती है तो सरकार इसे कैसे माफ़ कर सकती है? इस पर बड़े भाई साहब खूब ज़ोर से हँसे और बोले "तुझे इतना भी नहीं पता" मैंने गर्दन झुका ली मुझे ऐसे देख बड़े भाई साहब शांत हो गए और बोले "सरकार बिल माफ़ नहीं करती बल्कि हमारे बदले का बिल वह कंपनी को अदा कर देती है और हमें बिजली बिल नहीं देना पड़ता बस।" अच्छा मतलब बिल तो आएगा मगर उसे हम नहीं भरेंगे सरकार भरेगी। पर सरकार इतने पैंसे कहाँ से लाएगी? मैंने फिर पूछा । इस पर भईया फिर हँसे और बोले "सरकार पैंसे नहीं लाएगा हमने जो टेक्स भरा है उसी से वह बिल भर देगी और क्या" मतलब एक तरह से बिल तो फिर हमें ही भरना पड़ा न तो सरकार ने क्या किया? "यही तो ये सब चुनावी फंडे हैं बस और कुछ नहीं।" मैंने एक और सवाल पूछा तो सरकार को करना क्या चाहिए? "मेरे हिसाब से तो ये बिजली बिल माफ़ होने ही नहीं चाहिए क्योंकि इससे सरकार पर अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा और अतिरिक्त खर्च तो कभी भी सही नहीं होता। अगर सरकार को बिल माफ़ ही करने थे तो ज़्यादा से ज़्यादा 100 यूनिट माफ़ करते और जिसकी खपत 100 यूनिट से ज़्यादा हो यानी 101 यूनिट भी हो जाए तो उसे पूरा बिल भरना पड़े ऐसा होता तो शायद बिजली की खपत में कमी आती।

मुझे अब समझ में आ चुका था कि ये सब केवल चुनावी हथकंडे हैं जिन्हें वोट बैंक की राजनीति के लिए प्रयोग किया जाता है। जहाँ तक रही बात बिल माफ़ करने की तो वो तो हमें ही भरना है चाहे सीधे भरो या कोई और आपसे पैंसे लेकर भरे।

  मंथन